कई लोग वाराणसी की रोशन घाटों वाली तस्वीरें देखकर दिवाली की यात्रा बुक कर लेते हैं, फिर पता चलता है कि वे देव दीपावली की तस्वीरें थीं। दोनों पर्व दीपों से जुड़े हैं, पर एक ही दिन नहीं आते। दिवाली अमावस्या पर मनाई जाती है; देव दीपावली कार्तिक पूर्णिमा से जुड़ी है और सामान्यतः करीब पंद्रह दिन बाद आती है।
यात्री को क्या फर्क दिखेगा?
दिवाली में घरों, मंदिरों और मोहल्लों की पूजा व रोशनी का अपना अनुभव होता है। देव दीपावली में गंगा के घाटों की सामूहिक दीप-सज्जा मुख्य आकर्षण बनती है। भीड़ और वाहन व्यवस्था भी दोनों दिनों में अलग हो सकती है।
कब जाएँ?
अगर आपकी प्राथमिकता घाटों की बड़ी रोशनी है, तो देव दीपावली के कार्यक्रम की पुष्टि करें। अगर आप मोहल्लों के दिवाली माहौल के साथ शहर देखना चाहते हैं, तो दिवाली के आसपास की यात्रा चुनें। दोनों के लिए ट्रेन और stay में flexibility उपयोगी रहती है।
हर वर्ष चंद्र कैलेंडर और सरकारी घोषणाओं से तारीख जाँचें; पिछली साल की पोस्ट से अनुमान न लगाएँ। देव दीपावली planning guide पढ़कर घाट जाने का रास्ता भी तय करें।