सुबह के चार बजकर चालीस मिनट। गलियाँ शांत थीं, एक चाय वाला अभी-अभी चूल्हा जला रहा था, और मैं खुद से थोड़ा नाराज़ था कि इतनी जल्दी क्यों उठा। फिर मैं घाट पर पहुँचा — और नींद का सारा गिला भूल गया।

गंगा पुराने चाँदी के रंग की थी। कुछ दिये अब भी जल रहे थे, रात की किसी प्रार्थना के बचे हुए। कहीं एक मंदिर की घंटी बजी, फिर दूसरी, फिर दर्जनों। जब तक नाव चली और आसमान गुलाबी हुआ, मेरे रोंगटे खड़े हो चुके थे।

सुबह क्यों खास है

काशी के दो रूप हैं। शाम भव्य और भीड़भरी होती है — मशहूर गंगा आरती, रोशनी, मंत्र। पर सुबह निजी होती है। श्रद्धालु चुपचाप स्नान करते हैं, साधु सीढ़ियों पर योग करते हैं, और पूरा शहर वैसे ही जागता है जैसे हज़ारों सालों से जागता आया है।

आपकी पहली सुबह के लिए सुझाव

अगर काशी में सिर्फ़ एक काम करें, तो सूर्योदय के समय नदी पर ज़रूर हों।

सात बजे मैं फिर उसी चाय की दुकान पर था, कुल्हड़ हाथ में लिए, उस शहर को निहारता जिससे मैं अभी-अभी प्यार कर बैठा था। अलार्म ज़रूर लगाइए — यकीन मानिए, यह सुबह आपकी पूरी यात्रा बना देगी।