दो दिन बनारस के लिए कम हैं — पर इससे प्यार करने के लिए काफ़ी हैं। यह रही एक योजना जो ज़रूरी चीज़ों और बस बैठकर शहर को महसूस करने, दोनों में संतुलन रखती है।
पहला दिन — नदी और पुराना शहर
- सुबह 5:15: अस्सी से मणिकर्णिका तक सूर्योदय नाव सैर।
- 7:30: घाट के पास कचौड़ी-सब्ज़ी का नाश्ता।
- 9:00: कॉरिडोर से काशी विश्वनाथ दर्शन।
- दोपहर: गलियों में जानबूझकर खो जाइए — रेशम की दुकानें, छोटे मंदिर, चाय।
- शाम 6:45: दशाश्वमेध की गंगा आरती, हो सके तो नाव से।
दूसरा दिन — शांति और संस्कृति
- सुबह: अस्सी घाट पर सुबह-ए-बनारस कार्यक्रम।
- दिन में: सारनाथ की यात्रा, जहाँ बुद्ध ने पहला उपदेश दिया।
- दोपहर बाद: बीएचयू परिसर और भारत कला भवन, या एक बनारसी रेशम कार्यशाला।
- शाम: इत्मीनान से भोजन — बाटी-चोखा, फिर मीठा पान।
थोड़ा खाली समय रखिए। बनारस के सबसे अच्छे पल वही होते हैं जो योजना में नहीं होते।
अपनी नाव, दर्शन और कैब एक रात पहले बुक कर लीजिए ताकि सुबहें तनावमुक्त रहें। बाकी शहर खुद सँभाल लेगा।